Tuesday, 16 January 2018

क्यों चल दिए

कह नहीं पाते कभी  क्यों चल दिए
रुक सकोगे क्या अभी क्यों चल दिए

रात-भर दीये जले खामोश ही
सुबह चहकी भी नहीं क्यों चल दिए

बात  सहने का ज़माना लद गया
आप यूँ  बिन कुछ कहे क्यों चल दिए

आहटों की गूँज-भर बाकी रही
सब दरीचे बंदकर क्यों चल दिए

खो गई सरगम हमेशा टेरती
चार दिन वंशी सुना क्यों चल दिए

होंठ हिलते देखते अरदास के
साथ ही चलते अभी क्यों चल दिए

    212  2212  2212               
                       कैलाश नीहारिका

Sunday, 7 January 2018

तत्पर हथेलियाँ


संग-सम्बन्धों की बात करते-करते
मौन ओढ़ लेते हो अनमने-से !
देख लेना
यूँ ही नहीं रहते एक-से
मुट्ठियों में कसे-सटे रेशे आसक्तियों के !

आगे बढ़े हाथ को
यूँ ही नहीं थाम लेतीं
तत्पर  हथेलियाँ
मन की परतों में दबे गोपन
यूँ ही पारदर्शी नहीं बन जाते
कोई बेवजह नहीं सँजोता
टेरती कशिश निगाहों में !

जंगल में नाचने से पहले
आकुल हो मोर जोहता नहीं
यूँ ही भरोसा सहचर का !

यात्रा कोई शुरू होती नहीं
अकारण ही
ऐसा भी जटिल नहीं
पाँव और डगर के सम्बन्धों की टोह लेना !

                    कैलाश नीहारिका 




                             
      

Tuesday, 2 January 2018

पीछे मुड़कर भी देखना



पायल, बिन्दी, कँगना से 
आगे निकल चुकी लड़की
पीछे मुड़कर भी देखना
चीन्हना उस साम्राज्य को
जहाँ गृह-कारा में बंद कई ज़िन्दा अस्तित्व और
विवशता के रुदन में दब गए मनभावन गीत
अजगरी जकड़न की वेदना से त्रस्त हैं  !

दोहराऊँगी आह्वान कि
बेगार मत ढोना 
किसी गन्तव्यहीन यात्रा की
बहुत-से पिंजरे हटाने हैं तुम्हें
जिनसे तुम मुक्त हो !
कुछ दबे गीतों के सुर भी  
दूर तक चल देंगे
पकड़ उंगली तुम्हारी
जो अभी असमंजस में हैं
होंठों की देहरी के भीतर !

तुम देखना मुड़कर 
कि अवरुद्ध साँसों को कुछ साफ़ हवा मिल सके 
कि सुन्न पंखों में जागें स्पन्दन 
कि फैसलों के पीछे हों कई पुख़्ता कदम 
कि शोर की जगह संगीत ले !
 
मैं मिलूँगी तुम्हें प्रतीक्षारत 
इसी मोड़ पर
हठी गान्धारी की आँखों पर से 
अनदिखी पट्टियाँ खोलते  
दुखती उँगलियों से !

                  कैलाश नीहारिका

Saturday, 30 December 2017

कविता की बात

उन्होंने कहा / कर्म से बदलेगी दुनिया / कविता से नहीं
मैंने खोजबीन की / कर्मवीर से मिली / देखा उसका कर्म
बातचीत की / चकित रह गई
बातें उसकी कविता ही थीं !

                           कैलाश नीहारिका    

Friday, 29 December 2017

आस का आँचल



212  2212  2212
कौन-सा आँगन जहाँ  पर ग़म नहीं
आस का आँचल कभी भी कम नहीं

राख में क्यों भूनते हो तल्खियाँ
आज जलवागर अँगारे कम नहीं

रूठकर आँसू बहाना छोड़ दो
दर्द का बेइन्तहा आलम नहीं

मौज दरिया की समन्दर से मिली
उम्र भर की वह रवानी कम नहीं

चाँदनी का नूर भी दिलक़श बहुत
बीत जाए दोपहर कुछ ग़म नहीं

कुछ मुकम्मल मिल गया इस दौड़ में
क्यों समझते हो किसी में दम नहीं

ज़ख्म ताज़ा ही रहे तो क्या कहें
पालते नासूर फिर मरहम नहीं

                   कैलाश नीहारिका

आजकल (ग़ज़ल)

  212  2122  222

आज भी सुर्ख़ियों में दिखते हो
इश्तहारों भरे हो बिकते हो

छत तले भी सजी है जलधारा
क्यों समंदर किनारे लिखते हो

आजकल फूल पत्ते बिकते हैं 
तुम बगीचा सँभाले फिरते हो
 
थोक में बिक रहे हैं शंख यहाँ
फूँकते हो कभी या डरते हो

इश्क़ क्या साथ चलना भी मुश्किल
खूब पहचान का दम भरते हो            

आदमी आदमी से डरता है
किसलिए शौक इतने रखते हो  

               कैलाश नीहारिका 

Wednesday, 27 December 2017

सँभल गई होगी

   212  212  1222

फिर वहाँ साँझ ढल गई होगी
वक़्त रहते सँभल गई होगी

देर तक रो सकी तभी सोई
ख़्वाब में अब बहल गई होगी

वह दिलेरी दिखा रही होगी
जिस्म-भर तो उछल गई होगी

बिजलियों की तरह गिरेगी वह
आसमां में मचल गई होगी

वे दरिन्दे अभी कहीं बाक़ी
मौत आते फिसल गई होगी

       (निर्भया के लिए )
         कैलाश नीहारिका