Tuesday, 21 May 2013

नेह से एकालाप

                                     

नेह, तुम किन लिबासों में लदे-सजे
भ्रमित-से अटक गए राह में    

मर्म तक पहुँच ही नहीं पाते 
लौट जाते हो
देह-भर तक पहुँचती 
अधबनी पगडण्डियों से !


बहुत ही सिंकुड़ के रह गया  
समय के आँगन में
तुम्हारा स्निग्ध अपना-सा बिछावन
बूझते हो क्या !
अपनी हड़बड़ी में डोलते  
झाँक नहीं पाते आस-पास भी
छटपटाता है जहाँ एकाकी  कोई  
संगहीन चिर आहत !
 

कैसे  तो सहेज लूँ  
रेशा-रेशा छीजते 
अविरल बन्ध रेशमी 
जाने क्या हुई सामर्थ्य नेह की
कौन करे पुनर्नवा नेह के सिवा  
रिसते-रीतते व्यक्तित्व भीतरी !
  
किन कुचक्रों में
कहाँ पर उलझ गए नेह तुम 
जाने कैसा इन्द्रजाल....
कौन-सी अंधेरी खोह 
लील गई 
ऊर्जा तुम्हारी चिन्मयी !

                कैलाश नीहारिका
                 

Friday, 3 May 2013

वक़्त की मेज़ पर




 वक़्त की मेज़  पर अखबार-से बदलते नहीं
 धूप के पहर की मानिन्द अक्स ढलते नहीं

 तेज  की बानगी उनके बयान भर में  नहीं
 ताप  सहते रहे  वे मोम से पिघलते नहीं
                    
 यूँ समन्दर  भरी   सीपें  सहेजतीं  बेखुदी   
 फिर सिरजतीं गुहर जो लहर में उछलते नहीं 

 चश्म की बेबसी  रुख़सत भरी नज़र में दिखी 
 क़ैद सब अश्क हैं, आज़ाद हो निकलते नहीं

 बदलते हों कभी मौसम कहीं सुलगती फ़िज़ा  
 शज़र पुरनम सदा पुख्ता वज़ूद हिलते नहीं

                       कैलाश नीहारिका

          
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