Saturday, 13 July 2013

कविता के नखों से


                    
कवि शोधती है मिट्टी   
फिर उगाती है धान से लेकर दूब तक !
महीन पीसती है कवि
कभी दरदरा और कभी साबुत अन्नदानों को ही
भाप से पका लेती है

वह कहती  है जो कुछ
एक तपती संवेदना से गुज़रकर
कहीं गहरे पैठ जाता है एक अदृश्य सन्देश -सा !

वह कविता के नखों से खोलती है गाँठें
गोंद से चिपकी  गाँठें
  भी !
पत्थरों के टुकड़े,  ईटें  जोड़कर कवि 
उसारती है मकान ,रचती है घर !
झाड़ती-बुहारती 
पुचकारती-दुलारती  है घर 
छिड़कती है जल तपते धूल कणों पर !
पसीने की गन्ध झेल लेती है 
स्नान की सम्भावनाओं को 
अस्तित्व में लाते-लाते 
कवि सजाती नहीं बिसातें 
रचती नहीं चक्रव्यूह 
वह रक्तिम आह्वान नहीं करती 
सोचती ही नहीं
बस्तियाँ उजाड़ने की बातें !
                         कैलाश नीहारिका