Monday, 21 October 2013

स्तब्ध आरोही


आसक्तियों के जंगल में
विषम हवाओं को झेलते हुए
टेरती  तुम्हें …
तुम जो अदीख नहीं हो !

और कभी
शिखरों की चढ़ान पर
अपनी ही अनुगूँज के
वर्तुलों से स्तब्ध होकर थाम लेती
अपने आँचल का कोमल छोर

ताकती डबडबाई दीठ से
दूर तक पसरे
आलोक को !
धीरे-धीरे टोहती फिर
भीतरी धरातल पर  
सम्बन्धों की व्यथा से
बाहर निकलने की राह !

देख पा रही
दूर-दूर तक फैली पगडण्डियों पर
कितनी ही कतारें
बढ़ती इसी ओर
धीरे-धीरे !

               कैलाश नीहारिका

Monday, 7 October 2013

अंतर्मेलन

         
आसक्तियों के  जंगल में
किसी दिन सहसा
जैसे शाम के धुंधलके में
आँख मलते-मलते
चीन्ह जाऊँ तुम्हें !

इस असीम जलराशि के
वायावी वर्तुलों से मोहभंग पर
भ्रमित-सी      अनायास ही
अंजुलि में मोती पाकर
अवाक रह जाऊँ तो.. ..!

यात्राओं की कड़ियों को जोड़ने
का हठ थामे 
मैं शाश्वत यात्री
कभी तुम्हारी
चुम्बकीय तरंगों की छुअन से चमत्कृत-सी
फैंक दूँ सारी लदान और..... 
दिशाओं के चयन का द्वन्द तज कर
बढ़ चलूँ उस ओर जहाँ .…
निजता के लघुतम अणु तक का 
अन्तर्मेलन, निर्विकल्प
पा जाऊँ तो ....!

  कैलाश नीहारिका