Friday, 10 January 2014

बिछोह

वर्ष भर पहले मैंने सुभाष नीरव जी द्वारा हिंदी में अनूदित  हरमहिंदर चहल की एक पंजाबी कहानी ममता  पढ़ी थी।........  एक गाँव के पास से गुज़रते हिरणों के झुण्ड में से एक शिशु हिरण को सरपंच के कुछ गुर्गे बलात पकड़ कर सरपंच के मकान के एक कमरे में बन्द कर देते हैं। .... फिर सरपंच की कोठी के पास से गुज़रते हुए माँ हिरणी का रुक-रुक कर विलाप करना .... अपने बच्चे को पुकारना और बार-बार हताश,बेबस होकर अपने झुण्ड के साथ लौट जाना , बहुत मार्मिक स्थिति....पर अन्त सुखद था। सरपंच के घर ठहरे मेहमानों का बच्चा उस हिरण बच्चे के बन्धन खोलकर उसे हिरणों के झुण्ड की ओर भगा देता है।
     ममता कहानी की हिरणी की खुशियाँ तो लौट आई थीं ....पर मेरे यहाँ बर्तन-सफाई करने वाली कमला ऐसी खुश किस्मत न थी। उसके बढ़ते गर्भ की स्थिति के चलते मैंने उसे कुछ महीनों के लिए काम छोड़ देने की सलाह दी लेकिन उसके हिसाब से इस तरह आकर काम कर जाना उसके लिए घर पर बैठने से बेहतर था। यह उसका पहला बच्चा न था , दो-तीन बच्चे पहले भी थे। दूर तक चलने में दिक्कत होने पर उसका पति उसे साइकिल पर बिठा कर लाने लगा। जब तक कमला मेरे यहाँ काम करती , वह पास पार्क में बैठकर इंतज़ार करता। मज़दूरी नहीं मिलने पर वह ज्यादातर बच्चों के साथ घर पर ही बना रहता।
         एक दिन  दमकता चेहरा लिए कमला ने मुझे बताया कि अब जच्चगी के लिए उसका पति उसे गाँव छोड़ कर आएगा। अपने पति के बारे में सोच कर वह थोड़ी उदास भी हुई लेकिन इस बात से ज्यादा खुश थी कि उसका पति अब उसे लेकर बहुत उदास था।
        बहुत से महीने बीत गए। एक दिन सहसा मैंने उसे उसकी दो-चार साथिनों के साथ अपनी गली में देखा तो पुकार लिया। वह आ गई। उसका आभाहीन विरक्त-सा चेहरा देखकर मैं हैरान थी। उसे एक और बेटा हुआ था जो अब ठीक-ठाक था। उसकी उजड़ी-सी दृष्टि देख कर मुझे बेचैनी हो रही थी-" तुम तो ठीक नहीं लग रही हो!"
क्षीण-से स्वर में उसने बताया कि गाँव के पास मेले के लिए जा रहे थे। और भी कई परिवार साथ थे। उसका दूसरा बेटा जो चार-पाँच साल का था , उनसे बिछड़ गया था। " पता नहीं बीबीजी, उसे कोई पकड़ के ले गया या वह नदी में गिर गया … बहुत ढूँढा , मिला नहीं। क्या पता जिन्दा है कि नहीं। " उसकी     पनीली  आँखों में   भटकती-सी पुतलियाँ मुझे विचलित कर रही थीं। उसकी देह से दुर्गन्ध आ रही थी। उसे शायद नहाने- धोने की सुध नहीं थी। उसके चेहरे पर पसरा घना उजाड़ देखते हुए मैं उस कमला को याद कर रही थी जो प्रफुल्लित -सी मुझसे विदा लेकर गई थी जैसे पहली बार माँ बनने जा रही हो ! इस कमला को तो उसके  नये  बच्चे की याद दिलानी पड़ रही थी !
 ममता कहानी की हिरणी  भाग्यशाली थी !
 नोएडा का ' निठारी काण्ड ' तो कई वर्ष बाद की घटना है !

                                                                 कैलाश नीहारिका 

Thursday, 9 January 2014

सँभालें अब तो


   2122  2122  2122  22

ये छतें दरकी हुईं क्यों ना सँभालें अब तो
मौत के मुँह से अज़ीज़ों को बचालें अब तो 

जिस्म  अधनंगे  छटपटाते  रहे ज़ख्म लिए 
पौंछ ज़ख्मों को  दवा-मरहम लगादें अब तो

फूल-फल, खुशबू  छिपे इनमें, घना साया भी
दूर तक बंजर ज़मीं  पुरनम बना लें अब तो

बस्तियाँ आजकल क्यों दिखने लगीं खौफ़ज़दा
साँप ज़हरीले छिपे  घर में, निकालें  अब तो

क्यों चुराए नज़र चारागर मुकर जाए क्यों   
दम लगाके बन्द दरवाज़े हिलादें अब तो

                       कैलाश नीहारिका