Wednesday, 27 August 2014

वह शहर का बाशिन्दा

 
वह शहर का बाशिन्दा सही भूला नहीं गाँव 
यह ख्वाहिशों का जंगल बटोही को मिली ठाँव

कुछ चाहतों की थकन कुछ झुलसाती कड़ी धूप  
वह ढूँढता है अब नीम-बरगद की घनी छाँव

सामान सारा  लेते  हुए छूटा  कुछ  ज़रूर
वह  देखता है स्वप्न  में उजड़ी-सी वही ठाँव

कुछ खोजती-थीं नज़रें किसी छत से कहीं दूर
पहुँचा कभी जो शहर फिर लौटा  ही नहीं गाँव

वह नापता आकाश  उड़ता  पहियों पर सवार
अब  याद-भर में शेष थे वे  दुखते थके पाँव

                                     कैलाश नीहारिका

Thursday, 14 August 2014

चौकन्ने शिकारी

क्या है कि मुझे अक्सर
सुनना फिर  सोचना  है
मेरे कन्धों पर सदा सवार एक सरोकार
--बचके रहना !

ये शरबती जुबानें
ये मखमली निगाहें
और नश्तरी इरादे !

ये  बेआवाज़ अट्टहास करते
मचान बाँधते
मोर्चे सँभालते चौकन्ने शिकारी
अदीख नख लिए
बिना सींग, बिना पूँछ !

इनके चलते फैलता निरन्तर
दमघोंटू  ज़हरीला धुँआ
गढ़ता आतंकी आकृतियाँ खतरनाक
सहजात वासियों की बस्तियों में !

 हवाओं में  सिरचढ़ी-सी  एक फुसफुसाहट
तैरती है दूर तक आजकल ---------
' बचना राधा-वल्लभ ! बचके रहना कनुप्रिया !'

                                          कैलाश नीहारिका



Wednesday, 13 August 2014

नमी के किस्से




पहाड़ यूँ ही नहीं घिसते, दरकते, बिखरते
तेज हवाएँ, बर्फीले प्रवाह,  बिजलियों भरे तूफानी अंधड़
इन सबको झेलते
और कभी किसी उल्कापिण्ड की
बौखलाई, बुझी चमक से भ्रमित- भौचक्क पहाड़
खोलते हैं अपनी बन्द मुट्ठियाँ
शिराओं की समस्त सनसनाहट को
झेलती मुट्ठियाँ !

पहाड़ों की खुलती मुट्ठियों से
झरते-झरते रेत
कुछ बखानती-सी  उतावली
शिखर से उमड़ता जल
आश्वस्त करते दौड़ता 
सहयात्रा का खुला आमन्त्रण थमाते
बढ़ता निर्बाध !

जल की यात्रा के समान्तर
साथ हूँ यायावर-सी
जाने कब से ……कब तक
साक्षी हूँ--

यह रेत बह जाएगी दूर तक
घुल न पाएगी, निथर जाएगा जल
इसके कण-कण में  नमी के किस्से होंगे
भले ही यह रेत सूख जाएगी !

                             कैलाश नीहारिका

Saturday, 2 August 2014

फूलों पर इतराते हैं


वे महज़ रखवाले फूलों  पे  इतराते हैं   
क्यों हवा पानी  धरती धूप बिसर जाते हैं                

दायरे अपनेपन  के तंग बहुत  तंग हुए 
बाँटकर टुकड़ों  में आकाश  मुस्कराते हैं

ज़िन्दगी भर हो तन्हा और मुस्कराए भी
किस  दिलेरी से  ऐसे  फ़ैसले  सुनाते  हैं

आपने देखा तो होगा कहीं मुकम्मल घर
एक-दूजे  की खुशियों को गले लगाते हैं

पेड़ की छाया भी उनकी वसंत भी उनका 
धूप-बरसातों  में जो  साथ  गुनगुनाते  हैं

                                 कैलाश नीहारिका