Sunday, 14 September 2014

राहत न रही

ख्वाहिशे-चैन में कुछ और भी राहत न रही               212 212 221 222 22
हसरतों के अजाने  खेल की चाहत न रही

सोचते हो यहाँ हर शय बहुत ही मँहगी है   
समझते ही नहीं किस चीज़ की कीमत न रही

जिस गुहर को लगे छूने वही शबनम निकला 
अब हमेँ बागवां से भी कुछ रक़ाबत  न रही

रंग खिलते रहे  हर बाग़ की शाखाओं पर
फूल काँटे सभी हासिल मगर शिरक़त न रही

वक़्त रिसता रहा ग़फ़लत भरे लम्हे बनके
होश आई मगर जब जोश औ ज़ुर्रत न रही

                             कैलाश नीहारिका