Monday, 24 November 2014

शृंखला का ओर-छोर


कितनी ही बार
ऊर्जा की उठती-गिरती तरंगों के साथ
मैं महसूसती निर्विकल्प प्यास
और तृप्ति भी
कभी-कभार !

प्यास सुखाती मुझे पकाती भी
तप्त हवाओं-सी फैलकर
धीरे-धीरे भरती मुझमें मिठास
तृप्ति सहेजती फिर कसमसाती
फिर-फिर जनती तप्त प्यास !

तृप्ति और प्यास की
इस शृंखला के ओर-छोर तक
मेरी कल्पना नहीं जाती
जा ही नहीं पाती  !

मस्तक में सोचता फ़कीर कोई
कहता ठठाकर
धरती की गोद से मेघ का नाता
अज्ञात तो नहीं
बरसता है
लौट आने को वहीँ !               

               कैलाश नीहारिका