Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर



दिलेर क्या दुराग्रही वे
जा ही नहीं पाये कभी
धर्मोन्माद की परिधि से बाहर !

अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते ही रहेंगे गोल-गोल
चक्रव्यूह को पुष्ट करते !

कँपा जाती है उन्हें
भीतर तक
परिक्रमा से बाहर होने की आशंका
सहेजते हैं धड़कनें थमकर !
                         कैलाश नीहारिका 

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home