Tuesday, 24 January 2017

भेड़ों की सँभाल

नहीं चाहिए मुझको
चरवाहे का एकान्त
आता ही नहीं मुझको
भेड़ों के संग रहना
झेलना उनको !
नहीं चाहिए भेड़ों की सँभाल का पारिश्रमिक मुझे
नहीं चाहिए उनकी खाल !

और यह भी सच कि
भेड़ें नहीं चुनतीं हाँके जाना
वे भी जी लेंगी अपने-आप
इतनी बड़ी
परस्पर पोषक सृष्टि में
क्या चाहिए उनको
मेरा नियन्त्रण, संरक्षण !

नहीं चाहिए उनको
मुखिया कोई
चल लेंगी सब गर्दन झुकाए पीछे
कोई एक चलेगी जिधर
वे नहीं जानतीं मतभेद या मनमुटाव
क्यों न जीने दूँ उनको
जैसी हैं वे !

                           कैलाश नीहारिका

3 Comments:

At 1 December 2017 at 08:00 , Blogger सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर भाव।

 
At 3 December 2017 at 08:23 , Blogger कैलाश नीहारिका said...

आभार जोशी जी !

 
At 3 December 2017 at 22:48 , Blogger संजय भास्‍कर said...

निशब्द...:) just want to say hats of to you mam...

 

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