Friday, 29 December 2017

सुर्ख़ियों में दिखते हो

  212  2122  222

आज भी सुर्ख़ियों में दिखते हो
इश्तहारों भरे हो बिकते हो

छत तले भी सजी है जलधारा
क्यों समंदर किनारे लिखते हो

आजकल फूल पत्ते बिकते हैं 
तुम बगीचा सँभाले फिरते हो
 
थोक में बिक रहे हैं शंख यहाँ
फूँकते हो कभी या डरते हो

इश्क़ में साथ-भर होना मुश्किल
किसलिए शौक इतने रखते हो

आदमी आदमी से डरता है
खूब पहचान का दम भरते हो            

बेगुनाही कहीं परदे पीछे
मंच पे हाथ बाँधे दिखते हो          

            कैलाश नीहारिका 

7 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ख़ुशी की कविता या कुछ और?“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  2. लाजवाब...प्रणाम

    ReplyDelete
  3. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 3 जनवरी2018 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


    ReplyDelete