Sunday, 7 January 2018

तत्पर हथेलियाँ


बात करते-करते
संग-सम्बन्धों के विमर्श पर  
मौन ओढ़ लेते हो अनमने-से !
देखते नहीं
एक-से रहते नहीं सदा
मुट्ठियों में कसे-सटे रेशे आसक्तियों के !

देखो कि आगे बढ़े हाथ को
यूँ ही नहीं थाम लेतीं
तत्पर हथेलियाँ
मन की तहों में
दबे अदीठ गोपन
ऐसे ही रेशमी फिसलन-से नहीं खुल जाते
कोई बेवजह नहीं सँजोता
टेरती कशिश निगाहों में !

जंगल में नाचने से पहले
आकुल हो मोर जोहता नहीं अकारण
अखुट्ट भरोसा सहचर का !

यात्रा कोई शुरू होती नहीं अधर से
बिना पृष्ठभूमि के
सोचो तो, ऐसा भी जटिल नहीं
पाँव और डगर के सम्बन्धों की टोह लेना !

                    कैलाश नीहारिका 




                             
      

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